Samaj Darpan · समाज दर्पण

A poem by Avinash Maddheshiya 'Swarthi' · अविनाश मद्धेशिया 'स्वार्थी' की कविता

POETRY · कविता

अविनाश मद्धेशिया 'स्वार्थी'

11/6/20261 min read

plain beige cardboard or recycled paper texture
a row of different colored masks on a black background
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सुनी जाती है झूठी बातें, सत्य का अब कोई मोल नहीं।
जीवन का आधार ही ईर्ष्या है, तो क्या शांति होगी कहीं?

ना ही बची है सादगी, लोगों के चरित्र चित्रण में।
ना ही बचा है, तनिक भी प्रेम लोगों के आत्म दर्पण में।
या यूँ कहलें की खो चुकी है ज़िंदगी, कहीं दूर अँधेरों में।
और गुम गये हैं सभी सबूत, काग़ज़ों के मेलों में।
बस रह गई हैं बातें और उनमें भरी सच की परछाई।
जो दिखती नहीं इन आँखों से, है ये कुछ लोगों की चतुराई।
जिनके मुख पे रहती है बातें, प्रेम की, अनुराग की।
पहन मुखौटे सज्जनता के, करते हैं घात भी, प्रतिघात भी।

खैर, सुनी जाती है झूठी बातें, सत्य का अब कोई मोल नहीं।
जीवन का आधार ही ईर्ष्या है, तो क्या शांति होगी कहीं?

— अविनाश मद्धेशिया 'स्वार्थी'